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केसर सिंह का घर बना अग्नि बेताल का अड्डा अगेवा गाँव में रहस्यमयी तंत्र-मंत्र का खेल
राजस्थान के जेतारण तहसील का छोटा और सुंदर गाँव अगेवा हमेशा से अपनी सहजता, मेहनतकश जीवन और आपसी भाईचारे के लिए जाना जाता रहा है। यहाँ की मिट्टी की सोंधी खुशबू, खेतों में हल चलाते किसान, चौपाल पर गूंजती हंसी और मंदिरों की आरती से निकली पवित्र ध्वनि-सब कुछ मानो एक आदर्श ग्रामीण जीवन का चित्र था। लेकिन कुछ महीने पहले इस गाँव की शाति पर अचानक अलौकिक संकट का साया पड़ गया। एक साधारण किसान केसर सिंह के घर में हुई अनोखी घटनाओं ने गाँव की नींद उड़ा दी और पूरे इलाके को भय और रहस्य के घेरे में डाल दिया।
रहस्यमयी शुरुआत
शुरुआत में लोगों ने इसे सामान्य दुर्घटना समझा। रात के सम्राटे में दीवारों से आती अजीब खटखटाहटें सुनाई देने लगीं। फिर धीरे-धीरे कंसर सिंह के घर में रखी वस्तुएँ बिना किसी कारण खुद-ब-खुद जलने लगीं-कभी कपड़े, कभी लकड़ी का छोटा फर्नीचर, कभी रसोई के बर्तन। बिजली विभाग को सूचना दी गई। तार, मीटर और स्विच की जाँच हुई। सब कुछ सामान्य निकला। लेकिन घटनाएँ रुकने के बजाय तेजी से बढ़ने लगीं।
एक घर की आग से पूरे गाँव में दहशत
एक रात केसर सिंह के रसोईघर में अचानक आग भड़क उठी। लपटें इतनी तेज थीं कि देखते ही देखते रसोई का दरवाजा काला पड़ गया और धुआँ आसमान तक उठ गया। चौकने पड़ोसी पानी की बाल्टियाँ लेकर दौड़े और किसी तरह आग पर काबू पाया।
लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। अगले दिन सुबह फिर से आँगन में रखखे सूखे बारे के ढेर में आग लग गई। दीपार की बच्चे पढ़ाई कर रहे थे कि अचानक कपड़ों की अलमारी से धुआँ निकलने लगा। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर यह आग लग कैसे रही है। गाँव की गलियों में अब भय का माहौल था। बुजुर्गों की चौपाल पर चर्चा अब लोकगीतों की जगह इसी रहस्यमयी आग पर केंद्रित थी। बच्यों की हँसी गायब हो गई थी और खेलकूद की जगह गाँव में खामोशी और डर का साया फैल गया था।
अगेवा गाँव में अग्नि बेताल का खौफनाक मंजर 70 दिन तक केसर सिंह का घर जलता रहा
अगेवा गाँव के किसान केसर सिंह का परिवार, जिसके घर से यह
संकट शुरू हुआ, लगातार 70 दिनों तक एक ऐसे भयावह दौर से गुजरा जो किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। दिन हो या रात, हर दो घंटे में अचानक केसर सिंह के घर के किसी हिस्से में आग भड़क उठती
कभी कपड़ों से भरी आलमारी में, कभी रसोईघर के कोने में, कभी दीवार से सटे लकड़ी के तखा पर। यह कोई साधारण आग नहीं थी, क्योंकि न तो वहाँ कोई चिंगारी दिखती और न ही कोई ऐसा कारण मिलता जिससे आग लग सके।
आग का पहला दिन आतंक की शुरुआत
पहले दिन दोपहर का समय था। केसर सिंह का परिवार खेत से लौटकर आराम कर रहा था कि अचानक रसोईघर से धुआँ उठने लगा। लोग दौड़कर पहुंचे और देखा कि रसोई में रखे सूखे लकड़ी के चूल्हे के पास बिना वजह आग भड़क रही है। किसी तरह पानी डालकर आग बुझाई गई। सभी ने इसे मामूली दुर्घटना मान लिया। लेकिन सिर्फदो घंटे बाद फिर से वही घटना हुई इस बार कपड़ों की अलमारी में। गाँव के लोग इकट्ठा होकर हैरान थे कि यह कैसे संभव है?
दिन-रात जलता घर नींद और चैन गायब
इसके बाद तो मानो पूरे घर में अदृश्य आग का प्रकोप शुरू ही गया। कभी फर्नीचर की दरारों से धुओं उठता। कभी दीवारों से लगी पराल (सूखी घास) सुलगने लगती। यहाँ तक कि फ्रिज के अंदर
रखी सब्जियों तक में आग लगने लगी। गाँववाले पानी की बाल्टियाँ और रेत की चोरियाँ लेकर हर वक्त तैयार रहने लगे। रात के समय ती केसर सिंह के घर के लोग सो भी नहीं पाते थे। दो घंटे में एक बार आग बुझाने का सिलसिला लगातार 70 दिनों तक चलता रहा।
गाँव का भय और बेचैनी
यह सिर्फ केसर सिंह के घर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे गाँव के माहौल को प्रभावित करने लगा। बच्चे डर के मारे शाम बलते ही घरों से बाहर निकलना बंद कर देते। महिलाएँ रात की रसोई का काम निपटा कर दरवाजे बंद कर देतों और बच्चों को अपने पास सुला लेतीं। खेतों में काम करने वाले किसान भी हर समय अपने सूखे अनाज और भूमे में आग लगने के डर में जीने लगे। रात के समय गाँव की गलियों में सन्नाटा और डर की गंध महसूस होती।
बुजुर्ग कहते, हमने अपने जीवन में इतना रहस्यमयी संकट कभी नहीं देखा। लोगों ने घरों के बाहर पानी के बड़े पड़े और मिट्टी की चाल्टियाँ रखना शुरू कर दिया।
खेतों में फैलती आग किसानों की नींद उड़ गई
सिर्फ घर नाहीं, बल्कि खेतों में भी आग लगने लगी। सर्दियों की सूखी फसले, भूमा और चारे के देर अचानक जल उठते। एक किसान के खेत में खड़ी फसल का बड़ा हिस्सा रातोंरात राख हो गया। ग्रामीणों ने चौकसी के लिए रात भर खेतों में पहरा देना शुरू कर दिया। कई परिवारों ने खेतों में पानी की नालियाँ खोद दीं ताकि आग फैलने से रोकी जा सके। फिर भी आग किसी अदृश्य ताकत की तरह अचानक प्रकट होती और सब कुछ भस्म कर देती।
लगातार जाँच लेकिन कोई कारण नहीं मिला
70 दिनों में गाँव कई बार सरकारी जाँच का केंद्र बना। बिजली विभाग ने केसर सिंह के घर के हर तार और मीटर की जाँच की। फ पर ब्रिगेड ने हर कोना खंगाला। प्रशासन ने आसपास की जमीन से गैस रिसाव की संभावना तलाश की। रसायन विज्ञान के विशेषज्ञों ने कहा कि यह मीथेन गैस हो सकती है, लेकिन गैस का कोई स्रोत नहीं मिला। किसी ने रासायनिक प्रतिक्रिया की ब्योरी दी, लेकिन यह भी प्रमाणित नहीं हुई।
हर प्रयास के बाद अधिकारी बस इतना
कहकर लौटते-
कारण समझ नहीं आ रहा। 70 दिन लगातार घटनाओं ने केसर सिंह के परिवार को मानसिक रूप से तोड़ दिया। रातों की नींद उड़ गई, बच्चों का पढ़ना बंद हो गया और महिलाएँ हर समय सतर्क रहतीं। गाँव के लोग हर दो घंटे में उठती लपटों और चीखों के बीच जीने को मजबूर थे। कई बार तो ग्रामीणों ने केसर सिंह के परिवार को उनके घर से बाहर निकालकर मंदिर में अस्थायी रूप से शरण दी, लेकिन अगली ही रात फिर आग लग जाती।
डॉ. प्रेमासाई जी महाराज ने किया चमत्कार
? रहस्यमयी चिट्ठियाँ 70 दिन के अंदर मौत की भविष्यवाणी अगेवा गाँव में आग का आतंक पहले ही लोगों की नींदें उड़ा चुका था।
हर दो घंटे में घर और खेतों में लगने वाली आग ने गाँव के हर व्यक्ति को भय और थकान से जकड़ लिया था। लेकिन जैसे यह डर काफी नहीं था, उसी चीच एक और रहस्यमयी और भयावह अध्याय की शुरुआत हुई-अनजान चिद्वियों का सिलसिला।
रहस्यमयी चिड्डियों का पहला आगमन
आग की घटनाओं के कुछ समाह बाद, केसर सिंह के घर के दरवाजे पर एक सुबह एक अजीब चिट्ठी पड़ी मिली। चिट्टी पर न कोई प्रेषक का नाम था, न पता बस भीतर डराने वाला संदेश लिखा था 70 दिनों के भीतर तुम्हारी पजी को मार दूंगा। केसर सिंह की पली मात्र 23 वर्ष की युवा महिला थीं। ऐसा स्पष्ट रूप से नाम लेकर किसी को निशाना घनाने वाली धमकी ने पूरे परिवार की रूह कंपा दी। शुरुआत में परिवार और पड़ोसी इसे मजाक समझकर टालना चाहते थे। लेकिन जब दूसरे और तीसरे दिन भी इसी तरह की चिद्वियों आती रहीं, तो गाँव का माहौल और अधिक भयभीत हो गया।
बढ़ता हुआ डर और अजीब रहस्य
चिडियों हर बार अलग-अलग स्थानों पर मिलती- कभी घर की दहलीज पर, कभी खिड़की की चौखट पर, कभी अलमारी के भीतर, तो कभी रसोई घर में। कभी वे पूजा घर में प्रकट हो जातीं, तो कभी अनाज के दिल्यों में दबाकर रखी मिलतीं। कभी बिस्तर के नीचे, कभी तकिए के भीतर, तो कभी परिवार के कपड़ों की जेबों में छिपी होतीं।
इन स्थानों की रहस्यमयता ने सबको हिला दिया-
मानो कोई अदृश्य शक्ति खुद चुपचाप घर में घूमकर ये विद्वियों रख जाती हो। परिवार के लोग पूरी रात पहरा देते. पर किसी को कुछ दिखता नहीं। गाँव के युवक रात भर बाहर घूमते, लेकिन चिट्टी आ स्रोत पकड़ नहीं पाते। हर नई चिट्ठी के साथ खतरे का संकेत और गहरा होता गया। कभी लिखा होता था 70 दिनों के भीतर तुम्हारी पत्नी की मौत तय है। ती कभी बस दो शब्द मौत निश्चित है। इन पंक्तियों ने पूरे गाँव की रूह की कंपा दिया।
जाँच-पड़ताल की असफलता
डर का असर इतना गहरा था कि गाँव के लोग तुरंत पुलिस और प्रशासन को सूचना देने लगे। पुलिस ने गाँव का कोना-कोना छाना। रात में विशेष गश्त लगाई गई। डाक विभाग से लेकर आसपास के गाँवों तक की जाँच की गई कि कोई डाकिया या संदेशवाहक तो जिम्मेदार नहीं। लेकिन किसी भी प्रयास से एक भी सुराग नहीं मिला। न कोई पदचिन्ह, न कोई गवाह। यह ऐसा लग रहा था जैसे ये चिद्रियाँ हवा में से निकल रही हीं। कई लोगों ने इसे काला जादू या तांत्रिक शक्ति का काम मानना शुरू कर दिया। कुछ का कहना था कि यह किसी पुराने दुश्मन का बदला है, तो कुछ ने इसे पूरी तरह अलौकिक घटना करार दिया।
केसर सिंह के घर पर अग्नि-बेताल का कहर राजस्थान में 70 दिनों का अलौकिक आतंक
अगेया गाँव (जैतारण तहसील, राजस्थान) में पिछले कुछ महीनों से केसर सिंह के घर पर लगातार हो रही आग की घटनाओं ने पूरे इलाके को दहला दिया। चिट्ठियों के सिलसिले के बाद यह भयावह घटना और तेज हो गई बंद तिजोरी और अलमारी में रखे कपड़े अपने आप जलने लगे।
आग का विस्तार और मजबूरी
केसर सिंह ने जितना समान हो सका बचा लिया और अपने परिवार के साथ रिशतेदारों के घरों में पनाह लेने लगे। लेकिन जहाँ भी केसर सिंह रुकते, अचानक यही अग्नि-बेताल की घटना घटित होने लगती। इसके चलते गाँव के कोई भी व्यक्ति रिश्तेदार या अन्य कोई भी केसर सिंह को अपने घर में पनाह देने के लिए तैयार नहीं था।
मजबूर होकर केसर सिंह और उनका परिवार घर के आँगन में नीम के पेड़ के नीचे ताड़-पत्री बिछाकर थोड़े बहुत सामान के साथ रात गुजारने लगे। लेकिन अग्नि-बेताल इतना निर्दय था कि बाहर भी आग फैलने लगी। दोपहर के समय चाहर रखी हुई चारपाई देखते ही देखते
जलने लगी, जबकि वहाँ 15-20 लोग मौजूद थे। (शेष... पृष्ट 5 पर)

